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40. ब्रह्म वंश म्हणजे काय ? 96 कुळी मराठा
BRAMHA VANSH
• ब्रह्म वंश –
• वंश सख्या 3
सूर्य वंश में ब्रह्मदत्त नामक चक्रवर्ती राजा हो गया । तबसे उसके वंशजों को ब्रह्मवंश नाम प्राप्त हो गया
मराठा वंश का निर्माण
मराठों का भाषागत या क्षेत्रगत विभाजन नहीं है जैसे ब्राह्मणों तथा राजपूतों में होता है । मराठा जाति के लिये इसी कारण से सभी क्षेत्र तथा सभी भाषाएं उसकी है । इसी विशेषता के कारण से विश्व भर के मराठा एक है । मध्यप्रदेश. उत्तरप्रदेश. राजस्थान . बिहार . दिल्ली . गुजरात . उतरप्रदेश. कर्नाटक . तमिलनाडु. केरल . बंगाल . उड़िसा आदि क्षेत्रों में मराठा लोग रहते है । इन सभी जगहों पर मराठा लोग राज करने की दृष्टि से पहुँचे तथा वही के स्थानीय नागरिक बन गये । अपनी मराठा संस्कृति के साथ उसी माटी की संस्कृति व भाषा को अपना लिया । इस कारण से मराठा जाति के लिये सभी भाषाएँ उनकी अपनी है तथा सभी क्षेत्रीय संस्कृति उनकी अपनी है ।
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• सूर्य वंश –
वंश संख्या 52 ये वंश अपनी विष्णु को अपना आदिपुरुष या मूलपुरुष मानते हैं । वैकुण्ठ का पहला राजा भगवान् विष्णु को ही माना जाता है । इन्हें आदिनारायण भी कहा जाता है तथा इन्हें क्षत्रिय माना गया है । विष्णु का पुत्र ब्रह्मदेव . ब्रह्मदेव का पुत्र मरीचि मरीचि का पुत्र काश्यप और काश्यप का पुत्र विवस्वान ऊर्फ सूर्य । इसी सूर्य से सूर्यवंश प्रसूत हुआ । सूर्य का पुत्र वैवस्त मनु हुआ ।
• चंद्र (सोम) वंश –
वंश संख्या 40 ब्रह्मदेव का दुसरा पुत्र अत्रि था । इस अत्रि का पुत्र समुद्र . समुद्र का पुत्र चंद्र (सोम) . चंद्र का पुत्र बुध ।
इस बुध का विवाह वैवस्वत मनु की कन्या इला से हुआ था । ईला को पृथ्वी माना गया है । इसी ईला से
उत्पत्र संतति के वंशवृक्ष को चंद्रवंश नाम दिया गया है ।
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धनंजय महाराज मोरे
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